REVIEW – Millennium Nights

मिलेनियम नाइट्स : नाम में कुछ सम्मोहन सा लगा। भीतर की टोह ली तो सम्मोहन बढ़ता चला गया। नशा छाना लाजिमी भी था, बातें और यादें नवोदय की जो थीं। मैं तो गहरे उतरते गई, यादों के गलियारों में कहीं खोती चली गई।
शुरुआत फ्लैशबैक तकनीक से की गई है और कहानी लेखन की यह पद्धति मुझे सबसे ज्यादा मोहती है क्योंकि आगे क्या होगा से ज्यादा जिज्ञासा और कौतुहल पीछे क्या हुआ होगा को लेकर हो रही होती है।
नवोदय के बाद दोस्तों का पुनर्मिलन, यादों के खजानों को खंगालना और बटोरना कुछ चिट्ठी-पाती, कुछ अनमोल तोहफे और भींग जाना भीतर तक फिर उन यादों में, इस पूरी किताब का सारतत्व है।
सौरभ, विवेक, मोहित, शिवम, राहुल…. विभा, कुसुम, सुमन, भूमिका, निशा…. नर्स मैम, पीटी मैम, हाउस मास्टर्स और उनके बीच का वो कभी न टूटने वाला मजबूत रिश्ता जो भले लड़ते-झगड़ते, डांटते-डपटते शुरू हुआ लगता है पर जिसकी अहमियत को कम-से-कम हर नवोदयन तो जरुर महसूस सकता है।
पी.टी., असेंबली, क्लासरूम, मेस से लेकर बाउंड्री पार तालाब-नहर और सिनेमाहॉल तक के किस्सों को बहुत रोचकता – बेबाकी और ईमानदारी से प्रस्तुत किया गया है। …. और कहानी में धारदार मोड़ बनकर आती है रुखसाना, जो है तो ओस सी शीतल और फूल सी कोमल, पर उसकी तितली सी चपलता कहानी को जबरदस्त संतुलन और गति प्रदान करती है।
कहानी की ताकत है उसका पात्रोचित और परिस्थितिनुकूल संवाद जो उपन्यास की कहूं तो जान है। कई सूत्र वाक्य लेखक की पैनी नजर को उद्धृत करते हैं। हॉस्टल लाइफ की एक-एक गतिविधि को पारखी नजर से जिस सूक्ष्मता से वर्णित किया गया है वह हर नवोदयन के दिल-ओ-दिमाग पर चलचित्रीय प्रभाव डालने वाला है और आप चाहकर भी शुरू करने पर बिना ख़त्म किए ठहर नहीं सकते।
और जो लोग नवोदयन बांड को लेकर अचंभे में रहते हैं उनके लिये यह पुस्तक श्रेयष्कर है, पढ़ें और अपनी जिज्ञासा शांत करें।
कहानी की शुरुआत और फिर अंत मे सौरभ के करियर और भविष्य को लेकर एक सकारात्मक आशंका शायद किताब के दूसरे भाग को लेकर इशारा कर गई क्योंकि उस कलम के जादू का क्या असर हुआ वह शायद कहीं अछूता रह गया।…. या इसे उपन्यास की महाकाव्यात्मक बुलंदी कह लूं कि कई तार आपस में जुड़ने से वंचित रह गए।
भीतर उतरती तो समीक्षा लंबी खींच जाती और मैं टाइपिंग के उलझन से बचना चाहती थी पर बहुत कुछ है जिससे छूकर आपको अद्भुत एहसास होने वाला है। तीनों स्वप्न प्रसंग मजेदार लगे , बलून यात्रा ने तो सचमुच रोमांचक मोड़ ला दिया और … मिलेनियम नाइट्स का ड्रीम सेक्वेंस तो प्रासंगिकता की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरा।
# मैं दुनिया जीतना चाहता हूँ,’ वह कह रहा था, ‘और मेरी वह दुनिया तुम हो’……
‘और अगर ऐसा हो पाया…. तो मेरी जन्नत पाने की ख्वाहिश ही खत्म हो जाएगी।’

kavitarajreviewauthor

 

कविताराज पद्मज

(अनुभूति-ए नवोदयन बॉन्डिंग की सहलेखिका एवं शरारत की लेखिका कविताराज पद्मज जी की कलम से)