120सेकंड

केवल 120 सेकंड और आपका ध्यान…

हम इंसान हैं तभी तो हमारे अपने व्यक्तिगत तर्क हैं, विचार हैं और अपना व्यक्तिगत ज्ञान हैं। हम जीवन भर किताबों के पीछे भागकर, अनुभव हासिल कर भी संपूर्णता नहीं पा सकते।

बड़ी से बड़ी वस्तुएँ हमारी पहुँच तो छोड़िए सोच से भी दूर हैं, वहीं सूक्ष्मता की असीमितता से भी आप वाकिफ हैं कि उसके दायरे तक नहीं पहुंचा जा सकता।

आप क्या मानते हो, आपकी क्या विचारधारा है, इस बात से फर्क नहीं पड़ता। आपकी विचारधारा भी दुनिया नहीं बदल सकती क्योंकि आपसे महाज्ञानी लाखों व्यक्ति अभी सात सौ करोड़ लोगों में विद्यमान हैं।

अतीत में भी ऐसे कई व्यक्ति आये जिन्होंने अपने ज्ञान से दुनिया बदलने का प्रयास किया किन्तु क्या उनकी विचारधारा संपूर्णता लिए हुए थी? असंभव…

तो फिर आप क्या बदलना चाहते हो, क्या आपको इस बात से अधिक ख़ुशी मिलती है कि आपकी विचारधारा एकदम सत्यवादिता से परिपूर्ण है और बाकी की अक्ल घास चरने गई है…

अगर ऐसा है तो फिर आप मानवता भूल रहे हैं। यकीन मानो दुनिया बहुत बड़ी है और उस सृजनकर्ता को, रचियता को आपकी ऐसी भागीदारी की कोई आवश्यकता नहीं है। वह स्वयं सम्पूर्ण है और उसे प्रकृति का संतुलन बनाना आता है और याद रखो इसमें हमेशा गणित के आंकड़े काम नहीं करते, उसकी महिमा, उसका चमत्कार, उसकी बुलंदी, उसका सामर्थ्य हम सबकी पहुँच से बाहर है।

और सबसे बढ़कर अपने धर्म, अपने ज्ञान का बखान करने वालों जिससे अन्य को ठेस लगे, जिससे अपने लोग दुखी हों; मानवता तो बिलकुल भी नहीं हो सकती। यकीन मानो दूसरों को बुरा कहने वाले, दूसरों पर कीचड़ उछालने वाले, दूसरों की आस्था का मज़ाक उड़ाने वाले, अगर जन्म से दूसरे धर्म में होते तो भी वे यही करते क्योंकि उस महान ईश्वर ने तुम्हें ऐसा ही बनाया है, तुम्हारे विचार ही ऐसे हैं कि बाकी लोगों को चुभे क्योंकि इसी से तुम्हें शांति मिलती है वरना दुनिया में चैन से जीने और अपनापन बनाये रखने वाले लोग भी हमारे बीच में हैं। तुम्हारा चाहे कोई भी धर्म हो तुम लड़ना, दूसरों पर कीचड़ उछालना, मज़ाक उड़ाना और मौका मिलने पर सैकड़ों आरोप लगाने का घटिया काम नहीं छोड़ सकते क्योंकि तुम्हारा स्वभाव ही ऐसा है…

तुम कभी धर्म के लिए लड़ोगे, कभी क्षेत्र के लिए, कभी समाज में तो कभी घर में; तुम लड़ोगे और लड़ाओगे क्योंकि तुम्हारा स्वभाव ही ऐसा है।

आप कैसे हो?
आपका व्यवहार, आपका चरित्र तय करता है, धर्म तो सभी अपने तरीके से जीने के लिए बनाये गए हैं तभी तो सभी धर्म में अच्छे लोग भी हैं और निःसंदेह उन अच्छे लोगों में एक आप हो जिसे सबके साथ भाईचारे के साथ रहना पसंद है तो फिर बाकी धर्म को निम्न स्तर का कैसे कहा जा सकता है।

जियो ऐसे कि अपनों के दिल में जगह बना सको,
वरना सबको तो एक दिन मिट्टी में ही मिलना है।
-अज़ीम

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