शहज़ादी

हर मुलाक़ात के साथ तुम मुझमें समाते जा रही हो, अनकही कहानी बनकर पन्ने पर उकेरी जा रही हो। तुम्हारे साथ विताये हर उड़ते पल यादों के गुलदस्ते बनकर निशानी छोड़ रहे हैं। बदलते हालात और बदलती जगहों पर तुम तितली सी बलखाती आ जाती हो और सब कुछ बदल जाता है जैसे सूरज की तेज़ गर्मी अच्छी लगने लगती है, सरसराती हवाएँ अपनी सबसे प्यारी धुन छेड़ देती हैं, लगता है मानो उस पल के लिए ही बचाकर रखे हों।

खैर तुम, तुम तो बेज़ुबाँ रहकर भी आँखों से बोल दिया करती हो जिन्हें हातिमताई के सात तिलिस्मी सवालों की तरह सुलझाना पड़ता है। तुम अगर ज़ुबाँ से कुछ बोल दो तो दुनिया वाले खा नहीं जाएँगे लेकिन तुम्हें तो जज़्बातों का नजाकत से मज़े लेना अच्छा लगता है तभी तो कीमती तोहफे की तरह संभालकर ही खर्च करती हो तुम। वैसे तुम्हारी सहेली विभा बता रही थी कि तुम बहुत बोलती हो लेकिन उसकी बात पे यक़ीन कैसे करूँ क्या तुम यहाँ बिंदास होकर अपने नार्मल रिश्ते वाले लोगों में मुझे शामिल नहीं कर सकतीं।

जब तुम मुझसे आँखों के अलावा भी बोलने लगोगी तब देखना तुम्हारी दुनिया कितनी बदल जाएगी, तुम साफ़ आसमान में भी इंद्रधनुष के सातों रंग देख पाओगी क्योंकि हमारे रूहानी रिश्तों की नमी से बादल बरस रहे होंगे। तुम देखना वो चाँद जो काफी दूर दिखाई देता है ना तुम्हारे जादुई अल्फ़ाज़ सुनने के लिए अचानक ज़मीन के करीब आ जाएगा तुम्हारेे वो अल्फ़ाज़ जो मेरे लिए निकले होंगे, जिसके लिए हर आशिक बेसब्री से इंतज़ार करता है।

देखो फ़रवरी आ गई है और मोहब्बत के रंग फैलने लगे हैं। हाँ लेकिन हमारी मोहब्बत उन लोगो की तरह नहीं है जो कुछ दिनों बाद ही अलविदा कह जाती है। हमारी मोहब्बत तो बस पानी की तरह अपना रास्ता खुद तलाश लेगी। लो अब फिर मुझे तुम्हारे वो अल्फ़ाज़ सुनाई देने लगे जो तुम कहते-कहते रुक जाती हो लेकिन मैंने इंतज़ार करना तो नहीं छोड़ा ना।

बेशक हम दोनों उस दूरी को महसूस कर सकते हैं जो दुनिया के लिहाज से बनी हुई है लेकिन हम कितने करीब है इसे या तो तुम समझ सकती हो या फिर मैं। और हाँ इतने दूर रहना भी तो ज़रूरी है ताकि ज़िन्दगी भर एक दूसरे को मिस करते रहें, ताकि यादों की गर्मी में सुलगते रहें। सुनो हर बार मुझे ऐसा लगता है कि ये दिल तुम्हें देखकर तुम्हारी रफ़्तार में चलने लगता है। जब भी तुम किसी महफ़िल में होती हो ये तुम्हारे अलावा कुछ महसूस ही नहीं कर पाता उस वक़्त पूरी जगह सिर्फ तुम्हारे लिए होती है। यह कह पाना शायद ठीक नहीं कि यह तुम्हारे लिए ही धड़कता है लेकिन यह तो कहा जा सकता है ना कि यह तुम्हारे साथ-साथ धड़कता है, तुम्हारे इशारे, तुम्हारी नज़र, तुम्हारी मौजूदगी इसे कंट्रोल करते हैं नाज़ इसीलिए तो तुम शहज़ादी हो और तुम्हारी अपनी सल्तनत है। 
©अज़ीम

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