वो बहत्तर घंटे

 



वो बहत्तर घंटे

सुनो, पता है तुम्हें देखने के लिए
मैंने कितना इंतज़ार किया?
नहीं, कैसे पता होगा तुम्हें

लेकिन हाँ, अब ये जान गया कि
कुछ लोगों के साथ हर लम्हे जीते हैं हम
हर पल, हर सांस पर उनके साथ होते हैं
कितना खामोश हो गया था मैं
जैसे सांसें अंदर लेते वक़्त मैं
उस खुशबु को समाने की
कोशिश कर रहा था जो तुम्हारी
पहली झलक में महसूस की थी।

कितना खामोश था मैं
सपने की तरह उस कत्थई ड्रेस को
लगातार निहारते हुए और
दिल में एक अजीब सा
ख्याल लिए बेपरवाह सा
सोचता ही जा रहा था मैं

सलीके से बिखरी हुई तुम्हारी ज़ुल्फ़ें
हवा के हर झोंके से सामने आकर
गालों को चुपके से छूते हुए मुझे
चिढ़ा रही थीं और जब तुम्हारे हाथ
से सरककर वापस मुड़ जाते तो
एक बार फिर रुखसार को चूमते
हुए चेहरे में वैसे ही बिखर जाते

और तुम्हारे मुस्कुराते होंठ भी
बेहिसाब ज़ीनत छिपाये हुए थे
तुम्हारे चमकते दाँतों से निकली हँसी
टनों भर ख़ुशी का मालिक बता रहे थे तुम्हें,
जिनकी कीमत दुनिया का सबसे अमीर
इंसान भी नहीं चुका सकता

और वो बारिश की बूँदें जो कभी कभार
हलकी सी गिरती फिर थम जातीं
वो शायद पसोपेश में थीं कि अगर
ज़्यादा गिरी तो सब कुछ थम ना जाये
और अगर न गिरी तो रिश्ते कहीं
हमेशा के लिए सूखे ना रह जाएं
फिर कुछ सोंधी सी मिट्टी की खुशबु
तुम्हारी ओढ़नी को महकाती हुई
तुम्हें मदहोश करने की कोशिश में
तुम्हारे अपने होने का एहसास
करा कर धीरे से खुद ही थम गई।

कुछ पल के लिए लगा जैसे
ज़िन्दगी जीना शुरू कर दी है मैंने
लगा जैसे ख्वाबों को हकीकत में
देखना शुरू कर दिया मैंने
संगीत के तार छेड़ दिए हों किसी ने
और कानों में खनकती और झूमती
आवाज़ गूँजने सी लगी यकायक

जाने क्या था उन पलों में जब
सब कुछ बर्फ सा जम गया था
जब जेहन में न कोई और चेहरा था
और ना ही किसी और का ख्याल
पता नहीं तुम्हें कुछ एहसास हुआ
या नहीं क्योंकि चंचल नदी की तरह
तुम और तुम्हारे ख़यालात आज़ाद थे

लेकिन अब मैं वो सब भूल जाऊँगा
कि कहीं मेरे दिल ने भी तुम्हें ना छुआ हो
मैं सब भूल जाऊँगा एक डर के साथ
कि कहीं
कि कहीं तुमसे सच में मोहब्बत ना हो जाये

©अज़ीम

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