Poetry

यादें दिसम्बर

यादें दिसम्बर

यादें जो अक्सर अपना रंग दिखाती हैं,
गुजर जाती हैं पर याद बहुत आती हैं।

हम भी खोएं हैं उसकी यादों में यारों,
और वो दिसंबर बनके यूँ गुजर जाती है।

मिल जाये ज़रा खैर-ओ-खबर हमें भी उसकी
जो आँखों में बसी रूह में उतर जाती है।

महफूज़ रही सदियों से वो मेरे इस दिल में
खुशबु बनके अक्सर वो महक जाती है।

टुकुर टुकुर देखता है चाँद भी उसे
महफिल में वो ज़ालिमा जब जगमगाती है।

नज़र ना लगे इसलिए पोशीदा रखा था
नूर है वो जहाँ का तो कहाँ ठहर पाती है।

ख्वाबों को हकीकत से जिसने बाँध कर रखा
नींद सी आकर सुनहरा पुल बनाती है।

रोओ, गिड़गिड़ाओ या जां निसार कर दो
सबके लिए बनी शय सबका दिल दुखाती है।

जारी है जुस्तजू उसकी ऐ मेरे मौला
धड़कन बनके हौले से जो गुनगुनाती है।

-अज़ीम

Author

azeem.shah61@gmail.com

Comments

Madhuri sahu
December 30, 2018 at 10:47 am

Superb poem



Mohit Thakur
December 30, 2018 at 12:52 pm

धड़कन बनके हौले से जो गुनगुनाती है
वो दिसम्बर की यादें यूँ गुज़र जाती हैं

एक #शानदार काव्य रचना 👌👌



Mohit Thakur
December 30, 2018 at 12:57 pm

#शानदार



Lipilipikadas1976@gmail
December 30, 2018 at 2:03 pm

टुकुर टुकुर चांद भी देखता है उसे… ……बहुत ही सुन्दर अहसास अज़ीम।। ये यादें बस खुशबू के महकते झोंके हैं जो वक्त बेवक्त हमें कुछ मीठे अहसास दे जाते हैं।keep writing.



Gagan k soni
December 30, 2018 at 10:30 pm

Bhut pyari poem hain 😍



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