यादें दिसम्बर

यादें दिसम्बर

यादें जो अक्सर अपना रंग दिखाती हैं,
गुजर जाती हैं पर याद बहुत आती हैं।

हम भी खोएं हैं उसकी यादों में यारों,
और वो दिसंबर बनके यूँ गुजर जाती है।

मिल जाये ज़रा खैर-ओ-खबर हमें भी उसकी
जो आँखों में बसी रूह में उतर जाती है।

महफूज़ रही सदियों से वो मेरे इस दिल में
खुशबु बनके अक्सर वो महक जाती है।

टुकुर टुकुर देखता है चाँद भी उसे
महफिल में वो ज़ालिमा जब जगमगाती है।

नज़र ना लगे इसलिए पोशीदा रखा था
नूर है वो जहाँ का तो कहाँ ठहर पाती है।

ख्वाबों को हकीकत से जिसने बाँध कर रखा
नींद सी आकर सुनहरा पुल बनाती है।

रोओ, गिड़गिड़ाओ या जां निसार कर दो
सबके लिए बनी शय सबका दिल दुखाती है।

जारी है जुस्तजू उसकी ऐ मेरे मौला
धड़कन बनके हौले से जो गुनगुनाती है।

-अज़ीम

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