मैं तुम्हें रोक ना पाया

मैं तुम्हें रोक ना पाया

वो आधे अधूरे से मुकम्मल पल
जो तुम्हारे साथ बिताए थे नाज़,
यादों का हिस्सा बन गए हैं।
वो किसी धुन में बेताबी लिए
तेज़ी से तुम्हारा आगे बढ़ना,
और फिर पास से गुजरती हुई
तुम्हारी अंजानी सी तस्वीर
जिसे महसूस कर ख़ामोशी से
एक ख़्वाहिश दिल में उठना कि
काश इस शख्स से बात होती
तो शायद दिन ही बन जाता।
और फिर अपने ख्यालों में खोए
खामोशी से भरे पलों में अचानक
उस खूबसूरत मूरत के कदम
मेरी तरफ धीरे से बढ़ गए
जैसे मुक़द्दर बन के खुदा ने मेरे
दिल की आवाज़ सुन ली हो
चंद लम्हों में वो भी हो गया
जो ज़िन्दगी भर भी ना होता
अपना मखमली हाथ बढ़ाकर
पहली बार जब तुम मिले थे
लगा जैसे ज़िन्दगी मिल गई
लगा जैसे सांसे थम गईं
लगा जैसे फूल बरसे और
अरमानों की बारिश हो गई
सुनहरे पलों को गढ़ने का
जादुई हुनर है तुम्हारे पास
वो तुम्हारा पानी की बोतल
थामकर मेरी तरफ बढ़ाना
जैसे कोई शीतल झरना
सौंप दिया था तुमने मुझे
और अब ये बेईमान पल
तेज़ी से बीते जा रहे थे
टहलती घड़ी अपनी रफ़्तार
अब सौ गुना बढ़ा चुकी थी
इससे पहले कि तुम मुझे
जाते-जाते अलविदा कहते
मैं तुम्हें रोकना चाहता था
लेकिन पहली मुलाक़ात में
जाने क्यों बेबस सा मैं
जाते हुए तुम्हें रोक ना पाया।
©अज़ीम

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Azeem – A Creative Soul

 

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