कीमती तोहफ़ा

एक सात, जैसे तारीख नहीं तुम्हारा साथ हो, हाँ तुम्हारा साथ ही तो लेकर आई थी यह तारीख…
पहली मुलाकात कुछ ऐसी मुकम्मल हुई मानो एक दिन में सदियों की ज़िन्दगी जी ली हो। अपनी इस मुख़्तसर सी ज़िन्दगी में मैंने जाने कितनी ज़िन्दगी जी है और हर ज़िन्दगी मुकम्मल।
आज फिर सांसें बेकाबू रफ़्तार से दौड़ रही थी। दिल खामोश होकर सिर्फ तुम्हारे नूर को महसूस कर रहा था, तुम्हारी शख्सियत से बिखरती रोशनी आज मेरी रूह में दमक रही थी। एक बार फिर मुझे अपने मुक़द्दर पे नाज़ करने की जायज़ वजह मिल गई थी।

“अस्सलामो अलैकुम…” एक मीठी खनकती आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला और अजनबी चेहरे से रूबरू होने का सिलसिला शुरू हुआ।
दरवाज़े से गुजरते हुए ही लगने लगा जैसे कोई बेहद ताकतवर चुम्बक मुझे अपनी तरफ खींच रहा हो और मेरे दिल में उथल-पुथल मचने लगी कि ऐसा कैसे हो सकता है। गहरे हरे रंग के बेलबूटे वाली कुर्ती में चेक वाली स्वेटर उसकी सादगी बनकर चमक कम करने की कोशिश कर रही थी जबकि उसके गले में प्यार से लिपटे दुपट्टे ने मुझे देखते ही चिढ़ाना शुरू कर दिया था।
उसे देख सुकून पाकर ऐसा लग रहा था मानो जन्मों की तलाश पूरी हो गई हो। उसका क्यूट चेहरा आँखों को छिपकर देखने के लिए मजबूर कर रहा था। और वो रूमानी एहसास अंदर तक ठंडक पहुँचा रहे थे।
तभी मुझे कंपकपी सी होने लगी। जैकेट पहनने के बावजूद जिस्म अंदर से कांप रहा था।
“चाय मिलेगी…?” मैंने धीरे से फरमाइश की।
“हाँ, बिलकुल।” वह मुस्कुराते हुए जवाब दी। उसने मुझे सर्दी से ठिठुरते देख लिया था।
वह फटाफट किचन में चाय बनाने में जुट गई और पाँच मिनट में ही गरमागरम चाय लेकर सामने आ गई।
“चाय…” वह फिर मुस्कुराते हुए सामने खड़ी थी। उसके दोनों हाथ ट्रे को संभाले हुए मेरे कप उठाने का इंतजार कर रहे थे।
“पानी मिलेगा, थोड़ा सा…” मैंने फिर कहा। मेरी नज़र उसके खूबसूरत चेहरे को निहार रही थीं।
उसने ट्रे साइड में रखा और चुपचाप पानी लेकर आई।
“थैंक यू।” उसके हाथ से गिलास लेते समय धीरे से मेरे मुंह से निकला।
पानी पीकर चाय की चुस्कियों के साथ उसकी मिठास मेरे अंदर समाते जा रही थी। गर्म चाय से जिस्म में कुछ गर्मी हुई और कंपकपी बंद हो गई।
परिवार के सारे लोग आसपास बैठ चुके थे और वह भी तितली की तरह चुपचाप आकर सामने बैठ गई। बहुत देर तक गपशप होते रही और कई खास चेहरे खिलखिलाते हुए महफ़िल जमाए हुए थे। बीच-बीच में उसे उठना भी पड़ता था, वह अपनी बहन के यहाँ आई थी और कुछ काम भी निपटा रही थी।

रात में खाने का टाइम हो गया और फटाफट थालियां लगने लगी। बिरयानी के साथ दही और उसका सीधे सामने बैठकर साथ में खाना एक शानदार दावत रही। खाने के बाद कुछ और स्पेशल मिठाई सामने आ चुकी थी। कुछ देर और महफ़िल जमी रही जिसमें वह अपना जादुई असर डाल चुकी थी।

ऐसा लगा जैसे मोहब्बत हो गई हो उन लम्हों से, मोहब्बत में भींगी कलम कहाँ ठीक से चल पाती है, शुक्र है खुदा का जो मोहब्बत के नशे को हराम नहीं किया वरना मुझे कई बार दीन से बाहर होना पड़ता।

सुबह होते ही, दिल बेहद खुश था लेकिन उससे एक खास चीज़ की माँग कर रहा था। मन कर रहा था कि उसके साथ एक यादगार सेल्फी ले लेकिन यह सही नहीं था। पहले ही दिमाग उसकी सैकड़ों तस्वीरें खींचकर मेमोरी में हमेशा के लिए सेव कर चुका था।

“सुनो, मुझे कोई कीमती चीज़ चाहिए…” आँखें उसे देखकर ऐसा ही कुछ कह रही थीं और उसे सिर्फ वह समझ सकती थी।
“क्या…?” उसने मुस्कुराते हुए आँखों में ही बात की।
“कुछ भी ऐसा जो हमेशा याद रहे, जो तुम्हारे पास हो कीमती सा।”
वह अपने पर्स में देखने लगी कि शायद उसमें कुछ मिल जाये, उसे जब कुछ समझ नहीं आया तो होठ दबाकर सोचने लगी। कुछ देर के लिए उसकी आँखें बंद हो गई थीं।
“ठीक है।” वह ऑंखें खोलकर इशारे से बोली। उसे कुछ याद आ गया था और शायद वह मेरे लिए सरप्राइज था।
“तुम मुझे ऑफिस तक छोड़ दोगे?” उसने पूछा।
“हाँ बिल्कुल…” मेरे मना करने की कोई वजह नहीं थी। वैसे भी उसे ऑटो से जाना पड़ता।
“दूर है बहुत…”
“तो भी चलेगा…”
“आधा घंटा लगेगा…”
“कोई बात नहीं।”
“किराया भी नहीं मिलेगा…”
“चाहिए भी नहीं।”
“सोच लो…”
“सोच लिया…”
वह मुस्कुरा दी और ऑफिस जाने के लिए तैयार हो गई। वक़्त की रफ़्तार बाइक से बहुत ज़्यादा थी इसलिए कुछ देर में ही उसका ऑफिस आ गया।
“देखा मैंने अपनी सबसे कीमती चीज़ दी ना तुम्हें…” उसकी ऑंखें उतरते हुए कह रही थी लेकिन, “थैंक यू।” ऐसा कुछ निकला था उसके मुँह से फॉर्मेलिटी के लिए।
“हाँ, सही कहा। वक़्त से कीमती और क्या हो सकता है किसी के लिए। तुमने तो बोनस दिया है मुझे, थैंक यू सो मच।” मेरी आँखें कह रही थीं लेकिन, “माय प्लेज़र।” बस इतना निकला जुबान से। उसने सच में बेशकीमती मीठी यादों का गिफ्ट दे दिया था जो ज़िन्दगी भर सहेज कर रखा जा सकता था। वह अब ऑफिस की तरफ बढ़ रही थी।
“जाते-जाते ये आँखें एक बार तुम्हें जी भर कर देख लेना चाहती हैं। शायद इसलिए कि कभी यादों में भींगे, शायद तुम्हें मिस करे या फिर तुम्हें देखने को तरसें…” उसे जाते देखकर दिल कह रहा था।

दिल उसे अपने घर में जगह दे चुका था और दिमाग उसकी गिरफ्त में आकर कैद हो रहा था। दिमाग को उम्रकैद होनी थी मगर वह बच गया क्योंकि पहले ही किसी और से उसकी सगाई हो चुकी थी…
©अज़ीम

दोस्तों इसे पढ़कर कैसा लगा, कमेंट कर ज़रूर बताइयेगा। आपके कमेंट मुझे और लिखने का हौसला देंगे।

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